
बिलासपुर। लोक को फोक का पर्याय मानकर विवेचित करने वाली पश्चात दृष्टि और उसका अनुकरण करने वाले अधिसंख्य को आड़े हाथों लेते हुए वरिष्ठ साहित्यकार, भाषाविद डॉ विनय कुमार पाठक ने बिलासा कला मंच द्वारा लोक संस्कृति पर आधारित संवाद “लोक संसार” विषयक विमर्श के प्रथम चरण का उद्घाटन करते हुए कहा कि भारतीय लोक में कोई भी गंवार या जाहिल नही है,वरन वह निरक्षर भट्टाचार्य है। डा पाठक ने लोकज्ञान को शास्त्रज्ञान से ऊपर बताया और इसे विज्ञान सम्मत निरूपित करके लोक परम्परा ,लोकवार्ता और लोक संस्कृति का आज के समय में अधिक प्रासंगिक निर्दिष्ट किया। उन्होंने कहा कि लोग लोकभाषा के साहित्य और लोक साहित्य को एक समझने का भ्रम पाले हुए हैं जबकि एक शिष्ट या परिनिष्ठित परंपरा है तो दूसरा वाचिक या मौखिक परंपरा ।
इसी क्रम में उन्होंने लोकगाथा और गाथा (बेलेड्स) को एक मानकर लोकसहित्य में शोध करने वालों को आड़े हाथ लिया और बताया कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी हिंदी साहित्य का इतिहास में लोरिकायन,ढोलामारू, आल्हा आदि अनेक लोकगाथात्मक स्वरूपों को गाथा कहकर ऐसे भ्रम को फैलाया है जिससे छत्तीसगढ़ी के तथाकथित आलोचक छत्तीसगढ़ी साहित्येतिहास को प्राचीन निर्दिष्ट करने के लिए लोक साहित्य और लोकगाथा की चर्चा करते हैं। ऐसी अनेक भूले हैं जिनका सुधार अब तक नही हो पाया है। इसी तारतम्य में बिलासा कला मंच ने विमर्श विषयक संवाद की संयोजना करके सार्थकता को सिद्धि की है। यादव भवन इमली पारा में आयोजित इस संवाद की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डा अजय पाठक ने की, संवाद की शुरुआत व संचालन करते हुए वरिष्ठ लोकसाहित्यकार,कलामर्मज्ञ डा सोमनाथ यादव ने लोक संसार पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हर माह लोकसंस्कृति पर आधारित संवाद आयोजित होंगे जिसमे संबंधित विषय पर विषय के जानकार विद्वान वक्ता लोकसंसार पर प्रतिभागी होंगे।कार्यक्रम का आभार प्रकट मंच के उपाध्यक्ष नरेंद्र कौशिक ने किया।
इस अवसर पर बिलासा कला मंच के पदाधिकारी, सदस्यगण, साहित्यकार,कलाकार आदि लोगो की उपस्थिति रही।