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April 4, 2025 11:05 am

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मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त संकट मोचन “हनुमान* की आज जयंती अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार ,भाषाविद डा.पालेश्वर प्रसाद शर्मा का पढ़ें विशेष आलेख

“जय जय जय हनुमान गोंसाई “

डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा

सतोगुण कॉप रहा है – तमोगुण से, और रजोगुण कॉप रहा है, सतोगुण से विश्वामित्र ताड़का से और विश्वामित्र से दशरथ भयभीत है – महर्षि को राम और लक्ष्मण, ब्रम्ह तथा वैराग्य दोनों चाहिए – जो बन गया वो बन गया यह आरण्यक संस्कृति की विशेषता है – संस्कार से विकार दूर होते हैं, और सदगुरू कल्याण करता है।

प्रभु का ध्यान – 4 प्रकार से करते हैं- 1. रूप 2 नाम 3 लीला और 4. धाम जितेन्द्रिय हैं प्रभु हनुमंत – संग दोष, स्थान दोष, अन्न दोष प्रकृति दोष से मुक्त होते हैं जितेन्द्रिय ।

“”तज हरि विमुखन को संग-सच है । बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार –

क्लेश के पांच प्रकार होते हैं- 1. अविद्या, 2. अस्मिता 3. राग, 4 द्वेष और 5. अभिनिवेश

1. अविद्या – पवित्र को अपवित्र करना, आत्म को अनात्म समझना, साफ को गंदा करना, साधु में असाधु देखना तथा सत् को असत् करना ।

2. अस्मिता – अहंकार – अहं मनुष्य को ब्रम्ह बनाता है, तो अहंकार उसे ब्रम्हराक्षस बनाता

है ।

3. राग – राग अनुराग मोहाविष्ट करते हैं।

4. द्वेष – सुख-दुख और भय मन को उद्वेलित करते हैं।

5. अभिनिवेश – मृत्यु का भय शास्त्र के अनुसार तीन मौलिक भय हैं – अ. मां की कोख से बिछुड़ने का भय ।

ब. पौरूष खोने का भय और

स. मृत्यु का भय

शरीर के छह विकार है 1 अस्ति 2. जन्म 3 वृद्धि 4 अंग परिवर्तन 5. क्षय 6. मृत्यु मन के छह विकार है – 1. काम, 2 क्रोध 3. लोभ 4 मोह 5. मद 6. मत्सर इस प्रकार सत्रह क्लेश होते हैं जिसे पावन प्रभु दूर करते हैं।

शुद्धि के भी सात प्रकार होते हैं – 1. देह शुद्धि 2. आंतरिक शुद्धि 3. काल शुद्धि, स्थान शुद्धि, 5. अन्न शुद्धि, 6 वस्त्र शुद्धि, 7. यज्ञोपवीत शुद्धि

शुद्धि क्या है ? आचार का नहीं, आकार का नहीं, मंदिर का नहीं, विचार का जीर्णोद्वार है।

रामचरित मानस संस्कृति का संविधान है –

( म राम, आ लक्ष्मण, न शत्रुघ्न स भरत) तुलसी का मानस परब्रह्म का आराधन है, तो उनकी रामायण गिरिजा, भूमिजा, जलजा है। तो हनुमान चालीसा – अभिमान, अपमान, अपवाद, असमान वृत्ति का त्याग – अभिमान, अपमान, शून्य साधना है। इसीलिये कौआ कथा कहता है और अभिमान शून्य होकर महाप्रभु महादेव राम कथा सुनते हैं।

श्रेष्ठ कवि वह है जो मनुष्यता को जगाता है, परन्तु महाकवि वह है, जो नर को नरोत्तम, पुरूष को पुरूषोत्तम बनाता है। इसीलिये तुलसीदास, सूरदास महाकवि हैं। एक ने श्रीराम को मर्यादा पुरूषोत्तम बनाया, तो दूसरे ने श्रीकृष्ण को लीला – पुरूषोत्तम बनाया है। दोनों पुरूषोत्तम ही । श्रीमत् हनुमंत – पंचमुख शिव के अवतार हैं – इसलिये उनकी जय पांच बार तथा प्रभु की परिक्रमा भी पांच बार करना श्रेयस्कर है।

शास्त्रियों का एक मत है कि पवन पुत्र हनुमान का अवतार नरक चतुर्दशी भौमवार को हुआ था— संभवतः उस अमावस्या – ग्रहण के दिन सूर्य को केतु के बदले अपने मुंह में रख लिया। हनु का अर्थ चिबुक भी है, सूर्य ज्ञान के देवता है – उन्हें ग्रहण कर लिया। ज्ञान के सातों भूमिका में हनुमंत अग्रगण्य हैं गान, ज्ञान, तान, व्याकरण – सबके विद्वान ठहरे। हनुमान जी का लंका दहन राग प्रसिद्ध हैं और अहिरावण वध हेतु नृत्यांगना बनते हैं- नर्तकी-कीर्तन करती है। यह एक अद्भुत वर्ण-विपर्यय है। इसीलिये बाबा तुलसी ने – जय हनुमान ज्ञान गुण सागर – लिखकर जय जयकार की हनुमान गुणों के सागर

है- सागर के सात लक्षण होते हैं- 1. गंभीर 2 गहन 3. विशाल 4 मर्यादित 5 पानी से भरा हुआ, 6. रत्न से भरा रत्नाकर, लक्ष्मीनारायण उसमें निवास करते हैं।

एक ओर धीर मारूति है तो दूसरी ओर गंभीर मारूति है- उनके गुणों की गणना कीजिये – एक ओर गीत है, तो दूसरी ओर संगीत है, एक ओर राग तो दूसरी ओर अनुराग, एक ओर ताल तो दूसरी ओर झपताल, एक ओर एकताल, तो दूसरी ओर त्रिताल, एक ओर सुर तो दूसरी ओर सरगम, एक ओर दूत तो दूसरी ओर रामदूत एक ओर धूत, तो दूसरी ओर अवधूत है। वे ब्रम्हानंद में लीन कपीश हैं। कवि का खलनायक मनुष्य को पशु बनाता है, तो नायक वानर को नर बना देता है।

रामदूत अतुलित बल धामा –

दूत चार प्रकार के होते हैं- 1. राजदूत 2. राहदूत 3 सीतादूत 4. रामदूत । राजदूत में रजोगुण, तमोगुण होते हैं-इंद्रियों का दमन या दहन नहीं वरन् दृष्टि तथा सृष्टिगत इंद्रियों को जीत लिया है। वेद-पुराण व्यंजन है, तो रामकथा तुलसीदल है- जिसके कारण व्यंजन भी प्रभु प्रसाद बन जाता है।

बल के सात प्रकार होते हैं – 1. मनोबल, 2 तपोबल, 3. प्रज्ञाबल, 4 हरिबल, 5. बाहुबल 6. दामबल 7. वैराग्य बल तो बलवंत हनुमान में 1. मनोबल 1 शुभ संकल्प, ख. उत्साह, ग. क्षमाबल 2. वचनबल तथा 3 नेत्रबल – पवित्र करूणा पूरित थे वीर क्षमाशील थे- अंजनि कुमार ।

एक सुखद सत्य है कि छत्तीसगढ़ की महतारी कौशल्या ईश्वर को मनुष्य – शिशु बना देती है और बोलती है- कीजै प्रभु सिसु लीला और शिशि रोदन शुरू कर देता है, सच है – भक्ति विराट को अपनी गोद में ला सकती है तो ज्ञान वामन को विराट बना देता है।

हाना सुना अब सीता माई गेंवाइस भगवान के पूंछी म आगी लगिस हनुमान के रामभक्ति में सुख, संपत्ति, परिवार, बड़ाई, बाधक है, तो मद, मदन, मत्सर अवरोधक है- इसीलिये महावीर ने कहा सब परिहरि करिहौं सेवकाई…. छह विभूतियां ईश में होती

है – ऐश्वर्य, ज्ञान, यश, वीर्य, वैराग्य, श्री तो ऐश्वर्य आदि से संपन्न ईश्वर कंचनवर्ण हनुमान है। कंधे पर यज्ञोपवित – तीन धागे ज्ञान, भक्ति, कर्म मंत्र, यंत्र, तंत्र या सत्, चित् – आनंद के प्रतीक हैं। बदल देता है। राम रसायन जो हनुमान जी के पास है – वह पूरे जीवन को

एक ओर कवीश्वर हैं, तो दूसरी ओर कपीश्वर जिनके प्रसाद से राम चरित मानस के सातो कांड-सोपान बने इसमें सात ऋषि भी हैं- ये सप्तर्षि उबड़ खबड़ मार्ग को सुगम बना देते हैं देवर्षि ब्रम्हर्षि, श्रुतर्थि, राजर्षि, कांडर्षि, महर्षि और परमर्षि – तथा प्रेम रसायन से रामायण ओत-प्रोत है। बालकांड में राष्ट्र प्रेम, अयोध्या कांड में पारिवारिक प्रेम, अरण्यकांड में साधु संत प्रेम, किष्किंधा कांड में मित्र-प्रेम, सुंदर कांड में स्वामी सेवक सुंदरता प्रेम, लंका काण्ड में मुक्ति प्रेम तो उत्तर कांड में समग्र अस्तित्व के प्रति प्रेम का पारावार है।

तुलसीदास की रचना शुद्ध कविता है, तो आज प्रायः मिलावटी कविता मिलती है। कवि या तो प्रकट कवि हैं, या कपट कवि… जाने कौन सच्चा है, कौन झूठा ? कवि का प्रभु प्रेम तो- वनप, उपवन, भवन, जीवन सब को पावन कर देता है।

कृपा करहु गुरु देव की नाई … “बलिहारी गुरु आपकी, गढ़-गढ़ सो सौ वार । मानुष से देवता किया करत न लारगी बार।”

आइये जीवन को भव्य नहीं दिव्य बनायें क्योंकि, हानि-लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि के पास है –

“जय अंजनि कुमार बलवंता । शंकर सुवन वीर हनुमंता ।।

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