कबीर वाणी की लोक व्यापकता
(६२६वें वर्ष में प्रसंगवश कबीर)
संयुक्त आलेख
: मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में ” कहने वाले कबीर की लोकव्यापी स्वर जन-जन के वाणीयों से मुखरित हो उठती है। कबीर खड़ा बाजार लिए लुकाठी हाथ…….. जो घर फूके आप न सो चलो हमारे साथ कहकर कबीर ने जनमानस को भरे बाजार में ” हृदय बसे तेहि राम न जाना ” की प्रमाणिक्ता सिद्ध कर दी ।
कबीर का अर्थ होता है महान बड़ा निडर और निर्भीक आज भी कबीर अत्यंत प्रासंगिक है, उनकी वाणी का सच तेज पूंज की तरह प्रकाश मान हैं। यह भी सच है आज बाजार वाद की दूनिया है, इस दुनिया में तरह-तरह के रंग बिरंगे आकर्षक वस्तुओं की बिकी हो रही है और लोग हैं की उसे पसंद कर खरीदे जा रहे है। ग्लोबलाइजेशन के युग में अक्षर ब्रम्ह का तेज ध्वनी विज्ञान से मतलब नही रखता बौर न ही कियी बात को हम ध्वनी योजना के द्वारा लोगो के पास रख सकते है। यह तब तक प्रभावी नही माना जा सकता, जब तक हम लोगो के दिल में उतरकर देश और दुनिया के सच्चाई को बयां नही कर देते । आज के बाजार वाद में आध्यात्म और दर्शन पर प्रवचन चौक चौराहे पर कहे सुने जा रहे है। पर कबीर के “हौ’ कहता निज आँखिन देखी तू कहता सब कागद लेखी, हौ कहता सुरझाई रे तू रहता सब अरझाई रे ।
कबीर लोकव्यापी कवि और समाज सुधारक है। समाज के समक्ष उन्होने अपनी वाणी को रखते हुए कहा कि ” कस्तुरी कुंण्डल बसै, मृग ढूंढे वनरायई” की भांति यह दुनिया ईश्वर को मंदिर में तो कहीं मस्जिद में ढूंढता फिर रहा है। मान अपने श्रेष्ठ कर्मों से ईश्वर के समतुल्य हो जाता है। आत्मतत्व की परम सार्थक्ता उसे पग-पग पर बुरे कर्मों से बचाते चलते है। विचारो की पवित्रता के समक्ष मानव जाति भेद वर्ण भेद, रंग भेद, वर्ग भेद से कोसो दूर हो उठता है। इसी लिए कहा भी गया है ” मन मलिन तन सुन्दर कैसे ?” मन न फिरावै आप न कहा फिराव मोहि… में काठ की माला जपने वालों के लिए कबीर का एक संदेश है !! ” पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़ ” में कबीर जनमानस को चेतावनी दे रहे है। कांकर पाथर जोरी कै मस्जिद लिये बनाय ता चढि मुल्ला बॉग दें, क्या बहिरा हुआ खुदाय । कहकर कबीर ने व्यंग्य के माध्यम से ” चिंटी के पग नेवर बाजै तो भी साहब सुनता है, की लोकव्यापी स्वर को जन-जन तक पहुंचा दिया।
मध्यकाल, भक्तिकाल का समय था सामन्त शाही प्रथा जोरो पर था ऐसे में सन्त कबीर को दबाने की कोशिश बहुत हुई, पर जितना उन्हें दबाया गया वे उतने ही मजबूती के साथ उभरकर लोकव्यापी होते गए । उदाहरण के लिए होली में गाये जाने वाले गीत के पहले गाली के रूप मे आज भी प्रयुक्त होता है। ” अरा ररा सुन ले भईया मोर “राम के कबीर ” इसी तरह से राउत नाच में कबीर के दोहे साखी तेजी से प्रयुक्त किए जा रहे है। संगीत विद्या नृत्य नाटक गम्मत में भी कबीर के पद साखी, सबद रमैनी को सुनकर श्रोता / दर्शकगण मुक्ध हो रहे है। गजलों में भी कबीर ने स्थानद बनाया है।
” मन लागा मेरे यार फकीरी में,
ताका नाका कबीर “
कबीर ने सत्य की सत्ता को अपने संघर्षो के द्वारा स्थापित किया इस स्थापना में कबीर को विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा दम दिखावा कूरीति ढोंग अंधविश्वास, पाखंड इन सब का कबीर ने जमकर प्रतिकार किया परिणाम यह हुआ की बूढापे में उन्हे काशी छोडकर मगहर जाना पडा । और वहाँ भी वे अपने वाणी के सच पर खरे उतरें और आज मगहर एक महान तीर्थ स्थली बन गया है। जो की दर्शनीय भी है।
कबीर की वाणी –
मन के हारे हार है मन के जीते जीत। पार ब्रम्ह को पाइये मन ही की परतीति । । काया कसू कमान ज्यों ।। पंचतत्व करि बाण || मारो तो मन मृग को ।
नही तो मिथ्या बाण ||
निष्कर्ष हम कह सकते है की कबीर का यह विश्वास था की जब मनुष्य में सम दृष्टि आ जाती है। तो वह ईश्वर का प्रतिरूप हो जाता है।
लोहा कंचन सम करि जानहि ।
तैं मूरत भगवाना ।।
कबीर मानवतावादी थे। उनकी दृष्टि में सभी मनुष्य एक ही समाज के अंग है। एक ही विशाल वृक्ष की विभिन्न शाखाओं के सामान है।
मेरा मन सुमरै राम को, मेरा मन राम ही आहि । अब मन राम ही होय रहा सीस नवावो काहि ।।
कबीर की लोकव्यापक्ता प्रामणित है।
कबीर का वास्तविक स्वरूप उनके विचारों में दृष्टव्य है। कबीर कहते हैं-
जब मै था तब हरि नहीं
अब हरि है मै नाहीं
प्रेम गली अति सांकरी
जामे दो न समाहीं
अर्थ यह कि मैं रूपी अहंकार से ईश्वर अल्लह को नही पाया जा सकता उन्हें यदि पाना है तो घमंड अहंकार को त्यागना ही पडेगा ढाई आखर प्रेम से ही परमात्मा को हम अपने आत्मा में प्राप्त कर सकते है। कबीर साहब की इस सरल साखी को सभी जानते है।
पोथी पढिपढि जग मुआ
पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का
पढे सो पंडित होय
कबीर का उदेश्य सामाजिक मानवीय मूल्यों की स्थापना है। मनुष्य को मनुष्य के रूप में पहचान देना है। आइए हम दोहराते है। कबीर की ये पंक्तियाँ-
अल्लह एके नूर उपाया ताकि कैसी निंदा
एक नूर से सब जग उपज्या
कौन भला कौन गंदा ||
और हम है के जाति धर्म, रंग, वर्ण, उंच नीच, काला, गोरा, गरीब अमीर मैं और केवल मैं मुझसे बड़ा कौन के चक्कर में जीवन ही नष्ट कर डाल रहें है। ऐसे में पग-पग पर कबीर हमें याद आते है.
सच बराबर तप नही ।
झुठ बराबर पाप के रूप में ।।
हिन्दी साहित्य आकाश के ध्रुव तारे संत शिरोमणी कबीर हमेशा अन्याय का प्रतिकार करते रहें। उनका जन्म सन 1398 में काशी नगर के एक जुलाहा परिवार में हुआ था। कबीर तत्व ज्ञानी थे, आत्म ज्ञान से वे सभी कुछ का अंदाजा लगा लेते थे, जो सच ही साबित होता था।
मसि कागद छू यो नहीं कलम गड्यों नही हाथ । चारो युग का महत्तम मुख ही जनावती बात ।।
इस पंक्ति का अर्थ कुछ लोग कबीर को अपढ़ के रूप में लगा बैठते हैं। पर ज्ञानी लोग इसके सही अर्थ को समझ जाते है कबीर पंथ में कबीर भगवान के रूप में पूजे जाते है। कबीर एक विशाल धर्म का स्वरूप छत्तीसगढ़ से उत्पन्न होकर पुरे विश्व में स्थापित हो चुका है। कबीर पंथ में कबीर को पूजने की प्रक्रिया अलग- अलग हैं, विविधताएं है क परम्परा सभ्यता जैसे चल पड़ा है।
हृदय बसे तेहि राम न जाना
कस्तुरी कुंण्डल बसे ।
मृग ढूंढे बन माहि ।।
ऐसे घट घट में राम है। कबीर का अर्थ होता है बडा “महान”
दूनिया जाने नाही ।।
हद सहै सो औलिया
अनहद सह से पीर
हद -अनहद दोनो सहँ
जो सुख पाऊं राम (नाम) भजन में, वो सुख नाहीं अमीरी में “
मन लागा मेरे यार फकीरी में ।
फिकर का फॉका करै ताका नाम कबीर । बुरा जो देखन मैं चलया बुरा न मिलाया कोय
जो दिल ढूंढा आपना मुझसा बुरा न कोय । आज बाजार बाद के युग में कबीर उतने ही अधिक प्रसांगिक है। सदगुरु कबीर सामाजिक जीवन की उपज है। जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार अन्याय भ्रष्टाचार, पाखंड अंधविश्वास कुरीति रूढ़िवादी, बेमेल सभ्यता संस्कृति बदलने लगती है तब-तब संतो ऋषियों, ज्ञानी, ध्यानी मुनि जन याद आने लगते है। उनके द्वारा कही गई अमृत वाणीयां ही हमारे जीवन को सुधारने में सक्षम होते है। सदगुरू कबीर तुलसी सूर जायसी, मलुका, पीपा का जन्म मानव मात्र को सदमार्ग पर लाने मानवता और विश्व बंधुत्व को देश और दुनिया में स्थापित करने के लिए हुआ था। 4 जून 2023 को कबीर की 626वीं जयंती मनायी जा रही हैं। इस अवसर पर कबीर को मानने वाले लोगो की जत्था, अलग अलग स्थानों में गिरी कन्दराओं पर्वतीय क्षेत्रों जंगली ग्रामीण इलाकों गाँवो शहरों तक कबीर के भजन नृत्य झांकिया चौका आरती जुलुस प्रसाद वितरण से लेकर साहित्यिक गोष्ठियों राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय सेमिनार आयोजन कर कबीर के मानवीय स्वरूपों सामाजिक योगदान का ही यशगान करते है। कबीर ने “आत्माराम को ही जागृत किया । लोक जीवन में कबीर आज भी विद्यामान हो उठते है उसका एक खास कारण है। उनकी सरल, सहज वाणी जो जन-जन को प्रभावित करते हैं। कबीर साहब द्वारा कहा भी गया –
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय |
औरन को शीतल करें, आपहू शीतल होय।
हिन्दी साहित्य के प्रमुख विद्वान डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने सदगुरू कबीर को ” वाणी के डिक्टेटर कहा ” और यह भी कहा की एक हजार वर्ष पहले के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व नही दिखाई पड़ता आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा है। साहित्य ही एक मात्र साधन है। जिसके सहारे हम देश काल परिस्थिति को जान समझ सकते है। तभी तो लोग कहते हैं साहित्य लोक जीवन की अभिव्यक्ति है।
कबीर वाणी का सच आज जीवन को सनमार्ग में पर ले जाने का है। इतनी उर्जा, इतनी शक्ति इतना प्रेम भरा पड़ा है, कबीर के दोहे साखियों और पदों में जिनका निरन्तर पठन पाठन से मन निर्मल हो जाता है। आईए सुनते है कबीर की कुछ पंक्तियाँ-जहाँ दया तहाँ धर्म है।
जहाँ लोभ वहां पाप ।
जहाँ कोध तहाँ काल है।
जहाँ क्षमा वहाँ आप ।
चलती चाकी देखि करि ।
दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में
साबित बचा न कोय
मोको कहाँ ढुंढे बंदे
मैं तो तेरे पास में
न मँदेवल न मस्जिद में
न काबा कैलास में
खोजी होय तो तुरत मिली हौं पल भर के प्रयास में ।