



बिलासपुर। कोटा विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशियों की क्या स्थिति है इसकी चर्चा करने की पहले रायगढ़ जिले के खरसिया विधानसभा क्षेत्र में तीन दशक पहले हुए चर्चित उपचुनाव की चर्चा करना बेहद जरुरी है जिसमे तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी ।
याद करें उस उपचुनाव की जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनने के 6 माह के भीतर विधानसभा का चुनाव जीतना जरुरी था। तब खरसिया के तत्कालीन विधायक लक्ष्मी प्रसाद पटेल ने स्तीफा देकर अर्जुन सिंह के लिए सीट खाली की थी । भोपाल से अर्जुन सिंह खरसिया आए तब भाजपा के फायर ब्रांड युवा नेता दिलीप सिंह जूदेव से उनका सामना हुआ। वही उनके प्रतिद्वंदी थे । उप चुनाव के नतीजे को लेकर पूरे देश की निगाहें खरसिया पर थी क्योंकि दिलीप सिंह जूदेव ने अर्जुन सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी थी इसका अंदाजा न तो कांग्रेस को और न ही अर्जुन सिंह को थी। उपचुनाव हालांकि अर्जुन सिंह ले दे कर जीत तो गए लेकिन उस क्षेत्र में एक नारा अवश्य गूंजता रहा वह नारा था ” परदेसी का संग और मेहंदी का रंग” जल्दी छूट जाता है। निश्चित तौर पर यह नारा अर्जुन सिंह के लिए था जो भोपाल से चुनाव लड़ने खरसिया आए थे।

कहते है इतिहास अपने को दोहराता है ।आज स्व दिलीप सिंह जूदेव के बेटे जशपुर से 400 किलोमीटर दूर कोटा में विधानसभा चुनाव लड़ने आए है तो खरसिया में गूंजा नारा “परदेशी का संग और मेंहदी का रंग”जल्दी छूट जाता है ,प्रबल प्रताप जूदेव के ऊपर भी सहज ही लागू होता है क्योंकि जूदेव परिवार और भाजपा ने तब अर्जुन सिंह को परदेशी कहा था आज प्रबल प्रताप जूदेव भी कोटा विधानसभा क्षेत्र के लिए परदेशी ही तो है ।

कोटा के मतदाता उन्हे पहली बार में ही स्वीकार कर लेंगे इसमें संदेह तो है और फिर प्रबल को राजनैतिक चातुर्यता तथा क्षेत्र की जनता का विश्वास अर्जित करने किसी बड़े नेता के सानिध्य की नितांत जरूरत है।उन्हे यह भी याद रखना होगा कि कोटा भले ही आदिवासी बाहुल्य है लेकिन जशपुर नही है ।किसी भी अन्य क्षेत्र में राजनीति करने के लिए उस क्षेत्र के लोगो की बोली और भाषा का भी ज्ञान होना जरूरी है ताकि साधारण बोलचाल की भाषा में और लोगो से मिलने जुलने के दौरान मतदाता पूरी तरह तो नही लेकिन कुछ हद तक उसे स्वीकार करने की स्थिति में हो ।

कोटा विधानसभा में भाजपा आज तक चुनाव नहीं जीत पाई है ।दो बार स्थानीय उम्मीदवार के रूप में काशी राम साहू को लड़ाने के बाद भी भाजपा को सफलता नहीं मिली उसके बाद भी जशपुर नरेश प्रबल को कोटा से चुनाव लड़वाने का मतलब यहां के वोटर यही लगा रहे है कि भाजपा के पास कोटा में चुनाव लड़ने और जीतने योग्य एक भी चेहरा नहीं है ।बड़ा सवाल यह भी है कि कोटा के मतदाता जब भाजपा के स्थानीय प्रत्याशी को नकार दिए तो फिर 400 किलोमीटर दूर के पैराशूट प्रत्याशी को कैसे आसानी से स्वीकार कर लेंगे ।प्रबल के कुछ चुनावी भाषण को सुनने से लगा कि कोटा क्षेत्र के प्रति उनका विजन स्पष्ट नहीं है।भाजपा लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर जीत सकती है लेकिन विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरा नहीं बल्कि लड़ रहे प्रत्याशी का चेहरा ,उनका हावभाव ,उनके बोलने का ढंग और राजनैतिक अनुभव भी महत्वपूर्ण होता है।विधानसभा चुनाव सिर्फ मोदी के नाम और उनके काम से नही जीता जा सकता।और फिर ऐसा विधानसभा क्षेत्र जहां से भाजपा कभी भी चुनाव नही जीत पाई वहां से जीत का इतिहास रच देंगे कहने का अत्यधिक आत्मविश्वास कही मुश्किल में न डाल दे।एक बात और भाजपा का एक बड़ा नेता नही चाहता कि उसके जिले में भाजपा के ठाकुर ,ब्राम्हण और ओबीसी प्रत्याशी चुनाव जीते।इसके लिए वह प्रयासरत भी है ।
अब बात करें कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव की तो वे इसी विश्वास पर चुनाव लड़ रहे कि कोटा तो कांग्रेस की परंपरागत सीट है और वर्ष 2018 का चुनाव वोटरों को गफलत में डालकर जोगी कांग्रेस ने जीता था।इस भूल का अहसास वोटरों को है और फिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा 5 साल में जो कुछ भी किया है जनता ने उसे महसूस किया है ।भूपेश है तो भरोसा का नारा पूरे कोटा विधानसभा में जोरशोर से गूंज रहा है उसके बाद किसानों की कर्ज माफी , धान 3200 रुपए में खरीदने,स्वसहायता समूहों की कर्ज माफी ,निःशुल्क शिक्षा, गैस सिलेंडर में 5 सौ रुपए की कमी जैसे वादों से कोटा क्षेत्र के मतदाता और कांग्रेस प्रत्याशी गदगद है।इसके अलावा कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव गांव गांव में सीधे, सहज, सरल रूप से ग्रामीणों से न केवल मिल रहे बल्कि ठेठ छत्तीसगढ़ी में उनके सामने भाषण देकर भूपेश सरकार की उपलब्धियों ,कार्यों और घोषणाओं का बखान कर तालियां बटोर रहे है ।चुनाव नतीजे चाहे जो भी हो लेकिन कोटा क्षेत्र के मतदाता हर बार की तरह इस बार भी जागरूक है और वे बेहतर नतीजे ही देंगे।
Wed Nov 8 , 2023
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