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April 4, 2025 6:41 pm

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छतीसगढ़ी साहित्य का अस्तित्व लोकव्यवहार से : डॉ फूलदास महंत

बिलासपुर 23मार्च 2024
शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय राजनांदगांव में  22मार्च को हिंदी विभाग द्वारा आयोजित”छतीसगढ़ी साहित्य”विषय पर विषय विशेषज्ञ /मुख्य वक्ता के रूप में डॉ फूलदास महंत विभागाध्यक्ष हिंदी शासकीय महाविद्यालय सकरी जिला बिलासपुर को आमंत्रित किया गया था।
अपने उद्बोधन में डॉ महंत ने भारत और विश्व में हिंदी की परचम फैलाने वाले राजनांदगांव के इस महाविद्यालय को कर्मभूमि बनाने वाले साहित्यकार मुक्तिबोध,बक्शी जी और डॉ बल्देव मिश्र को प्रणाम करता हूं,जिनके सूक्ष्म आशीर्वाद से मुझे इस महाविद्यालय में छतीसगढ़ी साहित्य पर बोलने का अवसर यहां के विचारवान प्राचार्य डॉ के एल टंडेकर,हिंदी विभाग की विभाग अध्यक्ष डॉ बी नंदा जागृत के आमंत्रण पर मुझे हर्ष के साथ यहां आना पड़ा।

छतीसगढ़ी साहित्य में मानवीयता,सरलता,सहजता,अपनापन,भरा पड़ा है , गद्य , पद्य में यहां की मौखिक,वाचिक और लिखित साहित्य लोक व्यवहार की दृष्टि से सरस है,इसीलिए यहां जो भी व्यक्ति बाहर से आता है वह यहीं का हो जाता है।” छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” का नारा कहने,बोलने,सुनने मात्र के लिए नहीं,अपितु उसे जीवन में उतारने के लिए है,इसीलिए “आप भला तो जग भला”कहा गया।छतीसगढ़ी साहित्य की रचना करने के पहले यहां के एतिहासिक और पूर्वजों के द्वारा दी गई हमारी संस्कृति को आत्मसात कर जीवन में उतारना जरूरी है,अध्ययन भी उतना ही जरूरी है,तभी हम छतीसगढ़ी में पढ़ने योग्य रचना कर सकते हैं।
यहां का लिखित एवम मौखिक साहित्य चौदहवीं शताब्दी से धर्मदास कबीरपंथ का उद्भावक धर्मदास के छतीसगढ़ी भाषा में लिखित पदों के माध्यम से आज से 600वर्ष पहले से मिलता है।इस दृष्टि से कमोबेश कबीर की आंखिन्न देखी की तरह वाचिक परंपरा के आधार पर सुदृढ़ है। छतीसगढ़ी में लेखन की गति आज से 100 वर्ष से अधिक हो रहे हैं,और समृद्ध साहित्य की झलक हमें लिखित रूप में यहीं से पढ़ने को मिलता है,यह सत्य है।प्रश्न उठता है कि छत्तीसगढ़ के माटी में जन्में हमारे मूर्धन्य साहित्यकारों ने छतीसगढ़ी भाषा में रचना क्यों नहीं लिखे?इसका उत्तर हमे यह मिलता है ,चूंकि छतीसगढ़ी,अवधी और बघेली जो अब भाषा का रूप लें चुकी हैं ये हिंदी भाषा की दुहिता हैं,इसलिए तत्कालीन समय में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए साहित्यकार हिंदी में ही लिख रहे थे।

छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों में गोपाल मिश्र,बाबू रेवाराम,गजानन माधव मुक्तिबोध,पदुमलाल पुन्नलाल बक्शी, डॉ बल्देव मिश्र, मुकुटधर पाण्डेय,लोचनप्रसाद पांडेय,और भी बहुतेरे साहित्यकारों ने छतीसगढ़ी को बोली के रूप में स्वीकार कर,हिंदी भाषा में लिखना उचित समझा। छत्तीसगढ़ पृथक राज्य बने आज 17वर्ष पूर्ण हो रहे हैं,छत्तीसगढ़ शासन ने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाकर 28नवंबर 2007से छतीसगढ़ी राजभाषा आयोग का गठन कर दिया है , ऐसे में जरूरी है कि छतीसगढ़ी को संविधान की 8वीं अनुसूची में जोड़वाने के लिए स्नातकोत्तर हिंदी की कक्षाओं से लेकर प्राथमिक शाला की कक्षाओं में भी छतीसगढ़ी भाषा के पाठ्यक्रम चलाकर विद्यार्थियों को बोलने ,पढ़ने,लिखने में छतीसगढ़ी भाषा का प्रयोग की जाय,तब वो दिन दूर नहीं कि हम छतीसगढ़ी को भारत सरकार के संविधान की 8वीं अनुसूची में भाषा के रूप में छतीसगढ़ी को जोड़वा सकेंगे।हमे आज छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों की कर्म भूमि राजनांदगांव से यह संकल्प लेना होगा कि हम सब छतीसगढ़ी को भाषा बनाकर ही उसे लोक व्यवहार की और काम काज की भाषा बना सकेंगे।
इस अवसर पर भारत भ्रमण पर निकले केरल ,महाराष्ट्र अहिंदी भाषी क्षेत्र के हिंदी के अध्येता छात्र छात्राओं के साथ भारत सरकार उच्चतर शिक्षा अभियान शिक्षा मंत्रालय भारत के सहायक निर्देशक डॉ किरण झा, डॉ जयपाल सिंह, डॉ संतोष बघेल,महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ के एल, टंडेकर,विभाग अध्यक्ष डॉ बी जागृत, डॉ नीलम तिवारी, डॉ प्रवीण साहू, डॉ गायत्री साहु,बिंदु डनसेना, रितु यादव,एवम स्नातकोत्तर हिंदी के छात्र छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित हुवे।
डॉ महंत को साहित्य रत्न सम्मान से प्राचार्य एवम हिंदी विभाग ने छत्तीसगढ़ की कलाकृति से बनी सूती वस्त्र, श्री फल,मोमेंटो,तथा साहित्य रत्न सम्मान की प्रमाण पत्र भेंट किए। केंद्रीय निदेशालय हिंदी के निर्देशक डॉ किरण ने धन्यवाद संबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ के धरोहर ,साहित्य के धरोहर को यहां आकर देखने के साथ कार्यक्रम और वसंतोसव मेसम्मलित होने का अवसर का हमे लाभ मिला, हम धन्य हुवे।
प्राचार्य डॉ के एल टंडेकर  ने मुक्तिबोध की इस कर्मस्थली में विश्व के लोग भ्रमण पर यहां आते है,हिंदी विभाग ने यहां अंतरराष्ट्रीय सेमिनार कराया है यह गर्व और गौरव की बात है, डॉ महंत के यहां आनेऔर छतीसगढ़ी साहित्य पर व्याख्यान से छात्र छात्राएं लाभान्वित होने।
आभार डॉ जागृत एवं प्रवीण साहु ने किया।

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