बिलासपुर ।आज बैंको के राष्ट्रीयकरण को 50 साल पूरे हो गए । देश प्रदेश व बिलासपुर में कोरोना के भयावह प्रकोप को देखते हुए बैंकर्स क्लब ने अपने सदस्यों व आमजनता के हित मे इस वर्ष राष्ट्रीय करण दिवस पर कोई भी आयोजन नही करने का निर्णय लिया गया हैं। बैंकर्स क्लब के समन्वयक ललित अग्रवाल ने बताया कि 19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश के 14 प्रमुख बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया था. इसके बाद साल 1980 में छह बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। श्रीमती इंदिरा गांधी की गरीबी हटाओ योजना से लेकर नरेन्द्र मोदी की महत्त्वाकांक्षी योजना मुद्रा लोन तथा कोविड 19 के लॉक डाउन के दौरान महिला जनधन खाता में तीन माह तक रुपये 500/- जमा व वितरण एवं किसान सम्मान निधि जमा तक सभी योजनाओं का क्रियान्वयन इन सरकारी बैंकों ने बड़े उत्साह से किया है।
श्री अग्रवाल ने कहा कि सबसे अभूतपूर्व कार्य नोटबन्दी के 54 दिनों तथा 24 मार्च 2020 के सम्पूर्ण लॉक डाउन से अनलॉक मे जान हथेली पर रखकर आज तक इन्ही बैंकों और कर्मचारियों ने करके दिखाया।
बैंक के कर्मचारी होने के नाते हमें गर्व है कि आज कोरोना की भयावता के बीच अपनी व अपने परिवार की जान की चिंता को दरकिनार कर हमने बिना किसी भेदभाव से समाज के हर कोने, हर वर्ग के लोगों को आर्थिक मजबूती प्रदान की, उनके भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास किया। किसान हो या छात्र हो या व्यापारी हो या गृहणी हो या पेंशनर्स हो, सभी को एक साथ एक छत के नीचे सेवा दे कर, सोशल डिस्टेंस करवाने का अथक प्रयास कर सामाजिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन कर रहे हैं।
वैसे बैंकों का काम तो बड़ा है और कर्मचारी अपने घर से दूर होकर भी ईमानदारी से सरकार की सभी योजनाओं को लागू भी कर रहे हैं भले ही उन्हें कितनी भी चुनौती और बाहरी दबाव का सामना करना पड़े। आज बैंक कर्मचारियों शाखाओं के जरूरत के अनुपात में बहुत कम है और उन्हें इस काम के दबाव में भी सही वेतन एवं सुविधाएं नहीं मिल रही है। ज्ञात हो कि 1नवम्बर 2017 से ड्यू 11वे वेतन समझौते पर अभी तक कोई निर्णय नही हो पाया हैं। एक तरफ सरकार बैंको का विलय और निजीकरण करके सरकारी बैंकों को आम जनता की पहुंच से दूर करने का प्रयास कर रही और निजी कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने का हर संभव प्रयास कर रही। दूसरी तरफ, बैंक लोन डिफाल्टर के नाम सार्वजनिक नहीं करके उन्हें बचाने का प्रयास कर रही है। सरकारी बैंकों की वित्तीय हालत और कर्मचारियों की स्थिति अगर आज खराब है तो, सरकार की इन्हीं गलत नीतियों के वजह से है। हकीकत यह है कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं होकर सरकारीकरण ज्यादा हुआ।
यह अंत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारी बैंकों और कर्मचारियों की अच्छे कामों की चर्चा और प्रशंसा से ज्यादा, सेवा में यदि एकाध बार कुछ कमी रह जाए तो वो खबर सुर्खियों में आ जाती है। देश के सभी लोगों को समझना होगा कि जितनी अपेक्षा आप सरकारी बैंकों से करते हैं , उतना ही उनके लोगों को समझना होगा और उनके हर लड़ाई और आंदोलन में साथ देने होगा। देश का विकास तभी संभव है जब बैंकों का और उनके माध्यम से सभी वर्गों का विकास हो।
आईए हम सभी, बैंक राष्ट्रीयकरण के 51वी वर्षगांठ के अवसर पर शपथ लें कि बैंकों के राष्ट्रीयकृत स्वरूप की रक्षा करेंगे और आम जनमानस से अपील करेंगे और उनको भी प्रेरित करेंगे कि वे भी राष्ट्रीयकृत बैंकों को राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता का मान देंगे।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण दिवस पर हम समस्त उपभोक्ताओं और बैंकों के समस्त जुझारू साथियों को क्रांतिकारी शुभकामनाएं ।