बैंक राष्ट्रीयकरण की 51वीं वर्षगांठ ,
ऑल इण्डिया बैंक एम्प्लाईज़ एसोसिएशन की ओर से हम बैंकों के राष्ट्रीयकरण और इसकी 51वीं वर्षगांठ का अभिवादन करते हैं।
हमारे देश में, राष्ट्रीयकृत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वैविध्यपूर्ण आर्थिक विकास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिका का निर्वहन किया है। हमें गर्व है कि एआईबीईए ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए संघर्ष और आंदोलन में एक बड़ी भूमिका निभाई थी।
बिलासपुर । सीजीबीईए की जिला सचिव एन वी राव ने उक्त विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एक बहुत विशाल स्तर पर विस्तार हो गया है। बैंकों की शाखाएं देश के कोने-कोने में फ़ैल गई हैं।
आज़ सभी व्यावसायिक बैंकों की कुल जमाराशियां रू.138 लाख करोड़ से अधिक है। इस प्रकार, आम आदमी की बचत इन बैंकों में सुरक्षित है।
आज़, आम आदमी एक बैंक की शाखा में प्रवेश कर सकता है और बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठा सकता है।
आज़ बैंक का ऋण सभी जीवंत और मूलभूत क्षेत्रों के लिए उपलब्ध है – कृषि, रोजगार उत्पादन, गरीबी उन्मूलन, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण, लघु, मध्यम एवं सूक्ष्म उद्योगों, स्वास्थ व शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, निर्यात इत्यादि।
आज़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सरकारी योजनाओं और प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहे हैं जिससे विकास की गति में वृद्धि हो रही है।
आज़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक रोजगार सृजन, प्रत्यक्ष रोजगार और अप्रत्यक्ष रोजगार दोनों में सहायता कर रहे हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक तरक्की और विकास के इंजन बन गए हैं। बैंक राष्ट्र निर्माण के संस्थान है और हमें इन बैंकों को शक्तिशाली बनाना चाहिए।
जबकि पिछले पांच दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने विपत्ति में सेवक का काम किया है, उन्हें मजबूत बनाने और देश के स्वराज्य एवं आत्मनिर्भर भारत के लिए उन्हें आगे बढ़ाने की जरूरत है।
हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कमजोर करने या हमारे बैंकों का निजीकरण करने से आत्मनिर्भर या स्वयं पर भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता है। हमारे देश में निजी बैंकों के संबंध में हमारा बहुत कड़वा अनुभव रहा है।
हमारे बैंकों की सबसे मुख्य समस्या-
निजी कंपनियों और कॉरपोरेटस् के खतरनाक रूप से विशालकाय होते हुए ख़राब ऋण हैं।
यदि उन पर कठोर कार्रवाई की जाए और रकम की वसूली हो जाती है तो हमारे बैंक राष्ट्र के विकास में एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।डिफाल्टरों को छूट देने और बैंकिंग करने वाली जनता को उनकी बचत पर कम ब्याज देना तथा सेवा शुल्कों में बढ़ोत्तरी की वर्तमान प्रथा को तुरंत प्रभाव से रोका जाना चाहिए।
बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस का उत्सव मनाते हुए , हमारी निम्नलिखित मांगें हैं और इनसे हमारा अभियान जारी रहेगा।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मजबूत करो;
सभी बैंकों को समुचित पूंजी प्रदान करो;
निजीकरण के प्रयास बंद करो;
कारपोरेटस् के ख़राब ऋणों की वसूली के लिए कठोर कदम उठाए जाएं;
जानबूझकर ऋण नहीं चुकाना दंडनीय अपराध बनाया जाए;
सभी ऋण डिफाल्टरों के नाम प्रकाशित किए जाएं;
बैंक डिफाल्टरों को सार्वजनिक पदों से एवं चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाए;
वसूली कानूनों को शक्तिशाली बनाया जाए – आईबीसी की समीक्षा हो;
जमाराशियों पर ब्याज दर में वृद्धि हो;
आम जनता द्वारा बैंकिंग सेवा के उपयोग हेतु सेवा शुल्कों को कम किया जाए;
बेहतर ग्राहक सेवा के लिए शाखाओं में उचित संख्या में कर्मचारी मुहैया कराए जाएं;
सभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का उनके प्रायोजक बैंकों में विलय किया जाए;
एआईबीईए द्वारा इन मांगों पर शीघ्र ही राष्ट्रव्यापी अभियान प्रारंभ किया जाएगा।
इसकी शुरुआत करते हुए, हम,आज़, 2426 ऋण खातों की सूची जारी कर रहे हैं जो कि जानबूझकर ऋण नहीं चुका रहे हैं (विलफुल डिफाल्टर) और जिनके ऊपर बैंकों की कुल राशि रू.147,350 करोड़ बकाया है।