बिलासपुर— महिला एवं। बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी सुरेश सिंह को जिस तरह पदोन्नति दिया गया है उसके शिकायत का जिन्न एक बार बोतल से फिर बाहर आ गया है और यदि शिकायतों की निष्पक्ष जांच होती है तो भाजपा शासन काल मे महिला एवं बाल विकास विभाग में पदोन्नति को लेकर जो खेल चलता रहा है वह प्याज के छिलके की तरह एक एक करके उघड़ जाएगी ।
भाजपा शासनकाल में महिला एवं बाल विकास विभाग के उच्च अधिकारी मिली भगत कर नियम विरुद्ध अनेक कार्य करते रहे है । अनुचित लाभ उठाने के लिए नीचे से ऊपर तक के कुछ अधिकारीयो ने सुनियोजित ढंग से गिरोह की तरह काम किया जिसमें अपनो को लाभ पहुंचाने सारे नियम ताक पर रख दिये । जब कभी जांच की बात आई तो अपनो को बचाने जांच की दिशा ही बदल दी गई । विभाग में पदोन्नति देने के मामले में भी बड़ा खेल चलता रहा है । इसकी शिकायत एक बार फिर भूपेश बघेल की सरकार को भेज कर निष्पक्ष जांच की मांग कक गई है । शिकायत की प्रतियो का सिलसिलेवार अध्ययन करें तो निष्पक्ष जांच की मांग करना तो बनता है ।
कहावत है कि एक मछली पुरे तालाब को गंदा कर देती है यह कहावत महिला बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी एस.के.सिंह पर पुरी तरह खरी उतरती है सरकारी विभागों में जितनी पोल होती है उस सबको कैसे ढाका जा सकता है इस बारे में इस युवा को उसी वक्त सब कुछ मालूम था जब 1998 में इसने म.प्र.शासन में नौकरी प्राप्त की शासकीय नियमावली के अनुसार सबको परिवीक्षा अवधि पूरा करने के बाद ही नियमित नौकरी प्राप्त होती है एसके.सिंह अपने परिवीक्षा अवधि दो वर्ष में से एक साल 6 महिने 8 दिन अनुपस्थित रहे इसी दौरान म.प्र.छत्तीसगढ़ विभाजन कि प्रक्रिया शुरु हो गई और इस फाइल पर कोई प्रशासनिक आदेश नही हो पाया जिस व्यक्ति को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाया जाना था उसने बटवारे में छत्तीसगढ़ का दामन धाम लिया राज्य सरकार के प्रारंभिक 3 वर्ष तो आपाधापी में बीत गए जब राज्य में एसके.सिंह को अपने अनुकूल वातावरण मिला तो महिला बाल विकास विभाग में अपने जैसे कुछ और लोगो के साथ मिलकर इन्होने सीधी भर्ती का खेल खेला विभाग में उस वक्त रिक्त पदों कि संख्या 15 थी किन्तु सीधी भर्ती से 24 लोगो को नौकरी दी गई जिसमे पुर्व के नौकरी कर रहे 9 लोग शामिल है इन्होने कभी भी विभागीय परीक्षाओं को पास नही किया किन्तु व्यवस्था की खामियों का और पहुंच का लाभ उठाते हुए पदोन्नति पा गए सचिव स्तर के अधिकारी ने तमाम पुरानी बातो का जिक्र करते हुए वरिष्टता सूचि में एसके .सिंह को 39 नंबर पर स्थान देने का आदेश किया जिसने भी उक्त कार्यालयीन आदेश को बनाया है उसने स्पष्ट लिखा है कि 38 नंबर पर कौन है तथा 40 नम्बर पर कौन है और 39 पर एसके .सिंह का नाम रखा जाएगा.एसके .सिंह के परिवीक्षा अवधि का मामला लोकायोग में भी गया लोकायोग के दस्तावेज को देखकर यह लगता है कि सरकारी मशीनरी आयोग को एसके.सिंह के संबंध में देने नही चाहती थी इसके बाद भी आयोग ने एसके .सिंह के विरुद्ध कार्यवाही कि अनुशंसा कि जिन अधिकारियो को इसे अंजाम देना था वे न जाने इस अधिकारी से ऐसा क्या पाते रहे कि उसे बचाने के नायाब तर्क दे रहे है और विभागीय आर्डर शिट पर कुछ इस तरह कि टिप लिखी है कि “एसके.सिंह परिवीक्षा अवधि में अनुपस्थित थे यह मामला म.प्र का है कार्यवाही करनी थी तो म.प्र को करनी चाहिए थी “हमारे द्वारा कार्यवाही करने पर अधिकारी न्यायलय के शरण में जाएगा और स्थगन ले लेगा जिससे समय खराब होगा कुल इसी तरह के गोलगोल कथनों को लिखकर कई साल तक फाइल यहाँ से वहाँ घुमाई गई जिस व्यक्ति को नौकरी के बाहर होना था उसे प्रमोशन दिए गए और अब वह बिलासपुर में जिला कार्यक्रम अधिकारी है परियोजना अधिकारी से शुरू की गई जालसाजी अभी तक चल रही है एक तरफ सरकार एक आदिवासी जनप्रतिनिधि के जन्म प्रमाण पत्र को झूठा पा कर उसे कुछ ही घंटो में जेल भेज देती है और दूसरी ओर एसके.सिंह जैसे व्यवस्था के भीतर बैठे अधिकारी अपनी गलत नौकरी के बावजुद पदोन्नति पे पदोन्नति पाते है। हमारे पास उक्त पुरे प्रकरण के दस्तावेज उपलब्ध है और विभागीय अधिकारी अनुमति दे तो इसे कार्यालय के सुचना पटल पर टांगा जा सकता है जिससे कार्यालय के सभी कर्मचारी अधिकारी ज्ञान प्राप्त करे कि यदि गलत काम कर रहे व्यक्ति के पास हुनर है तो वह सत्ता और उसके पक्षकारो को कैसे मनमर्जी चला सकता है (