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April 5, 2025 8:35 am

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बरगद की जड़ की तरह मजबूत स्व.बिसाहू दास महंत जिन्होंने अपने जीवन में आदर्शों और मानवीय मूल्यों को मजबूती देकर बनाए रखा ,कुशल राजनीतिज्ञ और छत्तीसगढ़ के स्वप्नदृष्टा स्व.महंत की 44वी पुण्यतिथि पर विशेष आलेख


बबूल के कांटे जो गड़ते हैं,चुभते हैं,यह जानते हुये भी कुशाग्र बुद्धि के बाबूजी ने उनका उपयोग आलपिन के रूप में करना सीख लिया। जो कोई भी उनके निवास पहुंचता,भोजन करने के बगैर उन्हें वे वापस जाने नहीं देते।बड़े बड़े राजनीतिज्ञों को अपने ठेठ छतीसगरिया अंदाज के जिन्हे हम आज “गढ़ कलेवा”नाम देते हैं , उस समय से लेकर आज तक भी उनके परिवार में सहज,सरल, और स्वादिष्ट छत्तीसगढ़ीहा भोजन बड़े खुशी पूर्वक ग्रहण की जाती है।बाबूजी ने तो अपने गांव सारागांव से चावल मंगाकर खुशबू दार चावल बनवाकर परोसवाते ही नहीं,बल्कि जो कोई भी तारीफ उस चावल की करते उन्हें बोरी बोरी चावल भी जाते समय उनके गाड़ी में लदवा देते थे,यह और कुछ नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ को एक पहचान देना था,व्यवहार से,आदमियत से,अपना पन से,सरलता से,सहजता से,प्रेम और विश्वास से..राजनीतिज्ञ होकर जिन्होंने राजनीति नहीं की,केवल एक आदर्श से,मानवीय मूल्यों से अपनी अदद जीवन में पहचान बना लिया,वैसा अब कहां???अवसर वादी और स्वार्थ की दुनियां में अब राजनीति भी राजनीति नहीं लगती!!!कुछ ही लोग हैं,जिनसे राजनीति के गुण सीखने की जरूरत आज भी है,ताकि मानवता,और राजनीति में भी आदर्श को नए शिरे से पढ़ा और समझा जा सके।।
व्यक्ति के व्यक्तित्व की सच्ची परख लोकतंत्र के द्वारा ही देखा जा सकता है,खासकर राजनीति के संदर्भों में।सच्ची निष्ठा,ईमानदारी,भाईचारा,प्रेम और एक अदद आदमीयत की पहचान मानवमात्र के लिए इतिहास बन जाता है,साहित्य का रूप धारण कर लेता है,वहीं,चालाकी, कूटनीति,कुतर्कनीति,बेईमानी को साथ लेकर की जाने वाली राजनीति,राजनीति नहीं रह जाती, वह प्रजातंत्र के बीच दोहरे चरित्र की सीमा रेखा को भी चिन्हांकित करते रहते हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आज भी हम दलित शोषित ,पिछड़े और आदिवासियों की अहमियत को भुला नहीं सकते। महंत बिसाहूदास जी ,अनुशासन प्रिय थे,उनकी दृष्टि में अनुशासन से बढ़कर कोई चीज बड़ी नहीं थी,चाहे वह पार्टी हित की हो,या जन हित की या लोक हित की।जिनको जो अधिकार मिला है , उन्हें उनका अधिकार दिलाना,न्याय दिलाना इन सबका एक माध्यम मानते थे,बाबूजी अपने को। वे धर्म रहित राजनीति को राजनीति नहीं मानते थे,धर्म भी वो जो दिखावे का न हो एक रूप,रंग,भेद,चिन्ह,पहचान से नहीं,अपितु जन जन के मन के भीतर जिसे धारण किया जा सके उसे ही वे सर्व धर्म कहते थे।उनकी दृष्टि में जन कल्याण और जनसेवा की भावना का उदय हो ,राजनीति में यही उनका लक्ष्य था,केंद्र बिंदु थाl बाबूजी यह कहा करते थे”यदि राजनीति से सेवा भावना को अलग कर दिया जाय तो ,राजनीति का अर्थ ही बदल कर रह जायेगा,और राजनीति का अर्थ ही समाप्त हो जायेगा,इसलिए राजनीति ऐसी हो कि उसमें मानव सेवा की विशेष प्रधानता हो।””
महंत जी शब्द साधक थे,शब्दों का प्रयोग करना वे बहुत संभल संभल कर करते थे,इसके पीछे कारण यह था कि वे कबीर के सच्चे अनुयायी थे,कबीर की साखी, शब्द,और रमैणी को उन्होंने साँच को साँचा कहने की आदत डाल ली थी,वे मितभाषी,मृदुभाषी और मनोविनोदी भी थे,बड़े से बड़े लोगों की चिंता का हरण वे मिंटो में कर देते थे।
राजनीति में आपसी टकराव,मतभेद,आम बात है, उन दिनों श्यामा चरण शुक्ल जी के मंत्री मंडल में महंत जी भी मंत्री थे,कानाफूसी और चुगली के शिकार महंत जी भी हो गए,फलस्वरूप उनके विभाग में बदलाव कर दिया गया। लोगों ने महंत जी को इसके पीछे का कारण पूछने लगे, इस पर बाबूजी ने बड़े ही सहजता से,सामान्य ढंग से उत्तर देते हुवे कहा”शुक्ल जी “भोले भंडारी”हैं, शब्द प्रयोग में भोले शब्द पर अधिक बल देकर मुस्कान उनके चेहरे पर देखना कोई उन्हीं से सीखे।दरअसल शुक्ल जी और बाबूजी दोनो ही नागपुर से एल एल बी की उपाधि प्राप्त किए थे और दोनों ही प्रवीण थे।केवल 2ही वर्ष का अंतर दोनो में रहा है ।असल में आचरण और व्यवहार को सहज और सरल बना लेना कोई बाबूजी से ही सीखे। इन पंक्तियों में…
“जब मिला है जीवन
वो भी अदद चार दिन
मत मिटने दो ,तुम अपनी ही छाप
समेट लो सारे दर्द
भर दो खुशियों के सारे रंग,सारे रंग।।””
राजनीति के गलियारों में गांव,गरीब,और गलियों तक अपनी पहचान बनाने वाले, कबीर के सत्या अन्वेषी साधक के रूप में बाबूजी लोकप्रिय नेता थे,जब भी वे कहीं निकल पड़ते उनके पीछे पीछे हजारों में समूह निकल पड़ता,ऐसा लगता था जैसे बग,और पक्षी शूक का समूह अनुशासन,निष्ठा,ईमानदारी और जन सेवा,लोक सेवा का पाठ पढ़ने निकल पड़ा हो।इस वाक्या के लिखे जाने तक मुझे बाबूजी का प्रथम और अंतिम दर्शन आज तक मेरे मस्तिष्क में आज भी सुरति के रूप में स्थिर है,। उन दिनों मैं अपने गांव पुलाली कला के शासकीय प्राथमिक पाठ शाला का 5वी कक्षा का विद्यार्थी था,बाबूजी लोक निर्माण विभाग के साथ कई विभाग के कैबिनेट मिनिस्टर थे,गुंजन नाला में उनके द्वारा पुल निर्माण के लिए भूमि पूजन था, श्री लालकीर्ति कुमार सिंह जी विधायक के द्वारा उनका आना तय हुवाथा,जब देखते देखते एक तक बाट जोहते रहे तभी एकाएक सफेद सफेद कारो का लगभग 50से 80गाडियां पीछे पीछे आती जा रही थी,हम उस स्थान के घेरे में पहले से ही स्थान सुरक्षित कर लिए थे , ददा (पिताजी ) के साथ । उस स्थान पर पूजा के बाद बड़ेगैता को अपने हाथों से 5बार धरती से मिट्टी निकालकर बाबूजी ने भूमि पूजन कर दिया।धोती कुरता,और उसके ऊपर कोसे जाकेट पहने घुंघरालू बाल में बहुत ही आकर्षक लग रहे थे बाबू जी। ललाट पर सुंदर रेखाएं और दांतों की चमक आज भी विस्मृत नहीं होता।।
यह विचित्र संयोग है कि व्यक्ति सरल,सहज और साधारण होकर भी असाधारण के पद को प्राप्त कर ले,और असाधारण होते हुवे भी एकदम साधारण हो जाय,!!यह सबके बस की नहीं , बल्कि बिलडे लोगो में होती है।”
माननीय अर्जुन सिंह जी ने महंत जी के लिए कहा था_ “महंत जी किसी पद के लिए नहीं बने थे,बहुत से पद महंत जी के कारण सुशोभित होते थे।”
हाथ करघा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देना,और हसदेव बांगो डैम की परिकल्पना को साकार रूप देना,जिससे आज लाखों करोड़ों लोगों को पानीबिजली और पर्यटन के रूप में छत्तीसगढ़ कोरबा को जो स्थान पूरे देश में मिली है वह बाबूजी की ही सोच का परिणाम है।पूर्व विधान सभा अध्यक्ष मध्य प्रदेश श्री निवास तिवारी जी ने कहा था”वे ओजस्वी वक्ता थे,कुछ कर दिखाने के जज्बे के कारण वे संसदीय जगत के पुरोधा थे।,,”
बाबूजी जी के प्रथम गुरु माता पिता श्री कुंजराम महंत व गायत्री देवी महंत ,स्कूल के प्रथम गुरु श्री भुवन लाल राठौर रहे,जिन्होंने सारागांव जांजगीर चांपा में पढ़ाया था।पहली और दूसरी कक्षा माता पिता ने पढ़ाया और तीसरी कक्षा में दाखिले के लिए इंटरव्यू में प्रतिभा की चमक ने उन्हें यहां तक पहुंचा दिया की कक्षा 5की प्रविण्य सूची में 35शीट की उस समय1935में गवर्नमेंट स्कूल बिलासपुर में भर्ती हो जाना बहुत बड़ी बात थी।1946में बी ए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के बाद वे 1949में नागपुर कॉलेज से एल एल बी की उपाधि प्राप्त कर लिए।
यह अद्भुत संयोग है कि 13.14वर्ष की उम्र में महांतीन दाई जानकी देवी की शादी महंत बिसाहू दास जी के साथ हो गई।कबीरपंथी दाई जानकी देवी का उन्नत ललाट,गेहुवा रंग,अर्धचंद्राकार दोनो भौहों के बीच दाईं के माथे पर लगी बिंदी,नाक में सोने की फुल्ली में मुस्कुराहट लिए हुवे उनके चेहरे की आभा मंडल में छत्तीसगढ़ की शील वान नारी हृदय की संस्कार देखी जा सकती थी,जिसके आभा और प्रभाव ने आज गांव गांव में पलती बढ़ती, हस्ति शोभा बढ़ाती लोकसंस्कृति की गाथा आज भी छत्तीसगढ़ में गा रही है।महंत जी के लिए जानकी देवी केवल देवी ही नहीं,बल्कि लक्ष्मी और सरस्वती भी हुईं।
महंत जी लगातार मध्य प्रदेश की राजनीति में 1952से1977तक लगातार 6.6बार चुनाव जीते। उन्हें कभी भी पराजय का मुख नही देखना पड़ा,यहां तक कि चुनाव प्रचार में भी नहीं जाना पड़ता थाऐसे थेबाबूजी।
आपका जन्म 01अप्रैल 1924को सारागांव जिला जांजगीर चांपा में हुवा।आप अतिसय प्रतिभाशाली थे..आप बरगद की तरह थे,जिसकी जड़ें बहुत मजबूत होती हैं,आपका आदर्श और मूल्यों की,सत्य की,अधिकार की,वरिष्ठता की जड़ें बहुत मजबूत थी.आप के लिए लिखना भी सूरज को दिए दिखाना की तरह है,हमारे लिए।कुछ पंक्ति आपके लिए…

थूनी पर टिके हुवे लोग
सुविधा में बिके हुवे लोग
बरगद पर कर रहे विचार,
गमलों में उगे हुवे लोग।।
आपके सोच में आज भी कबीर दिखाई देते हैं,..
जैसे प्रीति कुटुंब सो
तैसी हरी सो होय
दास कबीर सो कहे
काहू न बिगारे कोय।।

आज आप जैसे राजनीतिज्ञो की जरूरत है,देश को दुनियां को,पर आप आज से 44वर्ष पहले छोड़ कर चले गए, पर आपका प्रभाव आज भी है,रहेगा,आप अमर हैं,
23,जुलाई 1978को काल के जाल में आप बंध गए।शरीर नहीं रहा पर आत्मा आज भी है,शास्वत हैं,।यह संसार ही कागज की पुड़िया जैसा है,पानी का बूंद पड़ते ही समाप्त होना है।सद्गुरु कबीर ने ठीक ही कहा है।।
क्या करिए,क्या जोड़िए,थोड़े जीवन काज।।
छाड़ी छड़ी सब जात हैं, देहगै ह,धन राज,।।

शिक्षाविद डा. फूलदास महंत

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