बिलासपुर| महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यालय में अजीबोगरीब और डंके की चोट पर स्वेच्छाचारिता का खेल चल रहा है । पर्यवेक्षकों और परियोजना अधिकारियों को स्थानांतरित स्थानों में रिलीव नही करने । कार्यालय में अटैच करके रखने और दूसरे स्थानों से स्थानांतरित होकर आए अमलों को काम नही देने जैसे गम्भीर शिकायतों के बाद अब लाखों की कमीशन खोरी के भी आरोप लग रहे है ।
आखिरकार महिला एवं बाल विकास विभाग में चल रही वसूली, कमीशन के खेल के कई परतें खुल गई जिनमें एनजीओ से अनुदान के लिए 20 प्रतिशत कमीशन कोरियर कंपनी की आड़ में वसूली और आंगनबाड़ी केंद्रों में गुणवत्ता ही आहार जैसे अनेको गम्भीर शिकायतों के बाद भी व्यवस्था में बैठे उच्च पदाधिकारियों को संज्ञान न लेने की आदत है। 17 जुलाई को जब” अपना घर “के संचालक से जिला कार्यक्रम अधिकारी का कमीशन नहीं हो पाया तो उन्हें एचआईवी बच्चों की संस्था बंद करने कहा गया। संस्था बंद हो जाएगी बाल संप्रेक्षण गृह की हालत शरणार्थी कैंप से भी खराब है।
यह जानते हुए संस्था के 3 बच्चों ने आत्महत्या की कोशिश की तब भी किसी बड़े जिम्मेदार अधिकारी समाजसेवी, राजनेता , क्षेत्रीय विधायक ने वहां जाना जरूरी नहीं समझा। 2 माह की उठापटक के बाद 17 सितंबर के दिन विभाग ने संस्था बंद करने का औपचारिक आदेश दे दिया। शाम को संस्था संचालक और संस्था के 15 एचआईवी पॉजिटिव अवयस्क कलेक्ट्रेट पहुंच गए कल ही रेट का ठेका हो रहा था जहां सैकड़ों लोगों ने एचआईवी पॉजिटिव अव्यसको को देखा। कोर्ट व सरकार का यह निर्देश है कि एचआईवी पॉजिटिव की पहचान गुप्त रखी जाए। धरा का धरा रह गया अखबारों में इन अवयस्कों की फोटो पीठ की तरफ से प्रकाशित हुई है किंतु संस्था के संचालक का चेहरा साफ दिखाई दे रहा है । अब तो यहां कहीं संचालक के साथ जो भी दिखाई देगा उसे एचआईवी पॉजिटिव मान लिया जाएगा। क्या महिला बाल विकास अधिकारियों की यही मानवीयता दिखाई देना शेष रह गई थी। एक महिला डिप्टी कलेक्टर ने मुद्दे को सुना और 17 तारीख को शाम 5:00 बजे के पूर्व बच्चों को सीडब्ल्यूसी देने के आदेश मौखिक रोक लगा दी, और शीघ्र ही मामला सुनने का आश्वासन दिया। अब सरकारी आदेश चाहे जो हो किंतु एचआईवी अवयस्क शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों के मानसिक तनाव की क्षति किसी शासकीय आदेश से नहीं की जा सकती साथ ही निजता के तमाम निर्देश धरे के धरे रह गए।