सनातन काल से रथयात्रा के पूर्व भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा का स्वास्थ्य खराब होने पर उन्हें 14 दिनों के लिये एकांतवास में रखकर उपचार किया जाता था। आज जब कोरोना फैला हैं तो हमें ज्ञात हुआ कि 14 दिनों तक कोरेन टाइन होने से आदमी स्वस्थ्य हो जाता हैं।
उक्त विचार व्यक्त करते हुए बैंकर्स क्लब बिलासपुर के समन्वयक ललित अग्रवाल ने सनातन संस्कृति के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए
बताया कि भारत कभी विश्व गुरु कहलाता था। भारत ने विश्व को सबसे सही कालगणना दी। भारत ने विश्व को आयर्वेद, धातु शास्त्र, संगीत दिया। सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा संस्कृत दी, वैमानिकी की कल्पना दी, युद्ध के लिए श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्रों की कल्पना दी, योग दिया, विज्ञान सम्मत जीवन जीने की विधि दी, शून्य और अंनत की अवधारणा दी, और भी बहुत कुछ दिया। भारत ने ही विश्व को एक और अप्रतिम अवधारणा दी- गणतंत्र की, सह अस्तित्व की, सर्व धर्म समभाव की। हमे अपने देश पर मानवता को अपने योगदान पर गर्व हैं। वैदिक संस्कृति की प्रत्येक रीतिरिवाजों को वैज्ञानिक कसौटी पर तौलते हुये उन्होंने प्रमाणित किया कि हजारों वर्ष पूर्व जब विज्ञान इतना विकसित नही हुआ था तब भी हमारे पुर्वजों ने अपने सटीक ज्ञान से काल गणना की थी जो आज भी प्रासंगिक हैं। दूरबीन के आविष्कार के पूर्व ही उन्होंने 9 ग्रहों को खोज कर ज्योतिष विद्या में पारंगत हुए थे। खाना पकाने के लिये मिट्टी, पीतल व लोहे के तथा खाने हेतु कांसे, पीतल तथा सुबह पीने हेतु तांबे के बर्तन इस्तेमाल करना भी स्वास्थ्य के लिये लाभदायक था। गर्मी में मटके तथा अन्य समय पीतल की गुंडी पीने के पानी को हमारे शरीर के अनुकूल बनाने में सहायक होती थी। बच्चो के जन्म पर नानी दादी हमेशा चांदी की कटोरी व चम्मच भेटकर नन्हें के दूध के माध्यम से उनके कण उपलब्ध कराने में सहायक बनती थी। जब हमारे पूर्वज ढाका की मलमल, सोने चांदी की नक्कासी, कोहिनूर को तराशने के हुनरमंद थे तो उन्होंने टेबल कुर्सी क्यो नही बनाई थी। क्योंकि हमारे शरीर की बनावट ही ऐसी हैं कि जब हम सुखासन अथवा आलती-पालती में बैठ कर भोजन ग्रहण करते हैं तो हाजमा ठीक होता हैं तथा पेट में चर्बी जमा नही होती। मानव शौच के लिये कमोड के बजाय हिंदुस्तानी पद्धति सर्वोत्तम हैं। *हमारे पूर्वजों ने नीम के एंटी वेक्ट्रॉरियल, पीपल के ऑक्सिजन, आवंला, बरगद, आम, गुणों से परिचित होने के कारण इन्हें पूजनीय बताकर हमें उपयोग करने हेतु प्रेरित किया था*। यदि हम पूर्वजों के इस ज्ञान को आगे बढ़ाया होता तो आज हमें कोरोना से डरने की जरूरत ही नही होती। अग्नि में भष्म हुई भभूत हमारे शरीर मे फासफोरस की कमी दूर करती हैं। हमारे प्राचीन योग ध्यान, प्राणायाम, मेडिटेशन के महत्व को आज विज्ञान भी स्वीकार कर रहा हैं *वैदिक संस्कृति का आधार ही विज्ञान* हैं। उन्होंने महिलाओं को भोजन में मसालों के फायदों की जानकारी भी प्रदान की। उन्होंने वस्तु विनिमय से मुद्रा के प्रचलन तक के इतिहास की भी जानकारी दी। हमारे पूर्वजो के ज्ञान पर हमें अभिमान भी हुआ। कुरीतियों को समय के साथ परिवर्तन करने की प्रेरणा प्राप्त हुई। सामान्य तौर पर हम समझते हैं कि धर्म का मतलब पूजा करने की पद्धति से कुछ लिंक होगा या कोई अगर मंदिर जाता है, तिलक लगाता हैं या पूजा-पाठ करता है तो कुछ उसे सनातनी समझते है।
जबकि धर्म का पूजा पद्धति से कोई लेना देना नहीं है, कोई संबंध नहीं है. *धर्म का संबंध तो संस्कृति से, परंपराओं से, जीवन मूल्यों से है*.
_धर्म एक कसौटी है जो आपको बताता है क्या आपके लिए करणीय है और क्या आपके लिए अकरणीय है, क्या आपको करना चाहिए और क्या आपको नहीं करना चाहिए._ अन्य धर्म के उद्गम के पूर्व सभी उसी तरह सुरक्षित थे। जैसे कोरोना के पूर्व मानव समाज। क्या हमें कल्पना भी थी कि कभी एक नन्हा सा वायरस सभी का जीना मुश्किल कर देगा। ठीक वैसे ही हम सभी अपने आप को सनातन संस्कृति के वाहक होने के नाते लापरवाही करते गए। हमारे भाई हमसे विमुख हो गए।
अब हमारा दायित्व हैं कि जिस तरह कोरोना से बचने के लिए मास्क, सोशल डिस्टेंस, हाथ धोने या सेनेटाइज कर रहे है। वैसे ही अपने करणीय धर्म को बचाने हेतु पहले स्वयं अपनी संस्कृति की गुणों से परिचित होकर दुसरो को भी बताए। जैसे कोरोना के संभावित संक्रमित को कोरेन्टीन कर संक्रमणों से दूर किया जाता हैं। वैसे ही हम *अपने भूले बिछड़े भाईयो को हिंसा, पाप से मुक्ति दिलाते हुए वापस मुख्य धारा में लाना हैं।*जब क्या आपको करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसकी कसौटी भारत की परंपराओं, भारत की संस्कृति, भारत के जीवन मूल्यों के अनुरूप है, तो आपका धर्म सनातन है. हमें इसके वैज्ञानिक आधार पर मनन कर कुरीतियों को त्याग कर सद्गुणों को अपनाना चाहिए।